ग्रेजुएशन के बाद मैंने पत्रकार बनने की ठानी।मेरा सपना पूरा हुआ और मुझे दाखिला मिल गया।लेकिन एडमिशन की खुशी कुछ ही देर में खत्म हो गई।जब मुझे पता चला अरे मैं तो नाम का पत्रकार ही हूं।
दरअसल मैं दुनिया को बदल नहीं रहा बल्कि मैं उस भीड़ का हिस्सा बन चला जो सिर्फ और सिर्फ नौकरी ही करते हैं।जी हां खबर आज वही है जो टीआरपी बढ़ाए।ये कड़वी हकीकत है जिसका सामना हर सुलझा पत्रकार करताहै।समाज को नई दिशा और विकास का रास्ता दिखाने के बजाए टीआरपी की जंग हर कोई जीतना चाहता है।अब पत्रकारिता बस पैसा और ग्लैमर का रास्ता बन कर रह गई है।
रविवार, 13 जुलाई 2008
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