फुर्सत के चंद लम्हों में भी बौद्धिक व्यायाम करने का मन होता है।सोचता हूं कुछ न लिखूं कमबख्त अंगुलियां कीबोर्ड पर अनायास ही दौड़ जाती हैं।देखते ही देखते मेरे मन की उथल-पुथल शब्दों के रूप में उकेर जाती है।सच पूछो तो मैं बहुत बड़ा लिखने वाला बनना चाहता हूं।मगर मुझे पता है लेखक बनने से पहले लिक्खाड़ बनना होता है।सो लीजिए एक नया पन्ना....छोड़िए....नाराज हो गये...चलिए कुछ कोशिश करता हूं।
आरूषि की हत्या के बाद तलवार परिवार गमजदा औऱ शक के घेरे में घर का नेपाली नौकर हेमराज था।लेकिन अगले ही दिन हेमराज की लाश तलवार के छत पर मिलने से पूरे नोएडा में सनसनी फैल गई।सबकी जुबां पर एक ही सवाल अगर तथाकथित कातिल ही मुर्दा हो फिर किसने की आरूषि-हेमराज की हत्या।नोएडा पुलिस जांच में जुट गई और मीडिया के रात दिन चिल्लाने से इतना प्रेशर हुआ कि यूपी के आईजी,डीआईजी और एसएसपी ने प्रेस कांफ्रेस करके आरूषि के बाप को ही उसका हत्यारा घोषित कर दिया।सीबीआई नौकरों की तिकड़ी को कुसूरवार माना।तो क्या दोहरे हत्याकांड का कातिल पकड़ा गया? जी नहीं कातिल अब भी नहीं मिला।आप की इस पर राय मुझे जरूर बताएं...........
मंगलवार, 22 जुलाई 2008
रविवार, 13 जुलाई 2008
शब्दभेदी
ग्रेजुएशन के बाद मैंने पत्रकार बनने की ठानी।मेरा सपना पूरा हुआ और मुझे दाखिला मिल गया।लेकिन एडमिशन की खुशी कुछ ही देर में खत्म हो गई।जब मुझे पता चला अरे मैं तो नाम का पत्रकार ही हूं।
दरअसल मैं दुनिया को बदल नहीं रहा बल्कि मैं उस भीड़ का हिस्सा बन चला जो सिर्फ और सिर्फ नौकरी ही करते हैं।जी हां खबर आज वही है जो टीआरपी बढ़ाए।ये कड़वी हकीकत है जिसका सामना हर सुलझा पत्रकार करताहै।समाज को नई दिशा और विकास का रास्ता दिखाने के बजाए टीआरपी की जंग हर कोई जीतना चाहता है।अब पत्रकारिता बस पैसा और ग्लैमर का रास्ता बन कर रह गई है।
दरअसल मैं दुनिया को बदल नहीं रहा बल्कि मैं उस भीड़ का हिस्सा बन चला जो सिर्फ और सिर्फ नौकरी ही करते हैं।जी हां खबर आज वही है जो टीआरपी बढ़ाए।ये कड़वी हकीकत है जिसका सामना हर सुलझा पत्रकार करताहै।समाज को नई दिशा और विकास का रास्ता दिखाने के बजाए टीआरपी की जंग हर कोई जीतना चाहता है।अब पत्रकारिता बस पैसा और ग्लैमर का रास्ता बन कर रह गई है।
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